शरत चंद्र की कहानियाँ हिंदी में | Sharat Chandra Stories In Hindi

रत चन्द्र की कहानियाँ: बांग्ला भाषा में यदि किसी साहित्यकार का नाम लिया जाये तो शरत चन्द्र का नाम उस लिस्ट में अवश्य लिया जाता है| शरत चन्द्र बांग्ला भाषा के उपन्यासकार के रूप में जाने जाते हैं लेकिन उनोने कई कहानिया भी लिखी हैं| शरत चन्द्र की कहानियों हिंदी भाषा में लिखी हुई ऐसी प्रतीत होती हैं जैसा की इसे किसी हिंदी भाषी ने ही लिखा हो|
sharat chandra stories in hindi शरत चन्द्र की कहानियाँ
शरत चन्द्र जी ने अपने जीवन में बहुत सी कठिनाईयां झेलीं और बहुत से उपन्यास लिखे, इन्होने सबसे पहले "बासा " नाम का उपन्यास लिखा और इन्हें खुद यह पसंद नहीं आया तो इसे फाड़ दिया| फिर एक के बाद एक कई उपन्यास इनके द्वारा लिखे गए| इसी प्रकार शरत चन्द्र हिंदी कहानियाँ भी लिखने लगे और सभी अत्यधिक पढ़ी गयीं| आज मैं आपके सामने शरत चन्द्र की हिंदी कहानियाँ (Sharat chandra stories in hindi) लेकर आया हूँ| यदि आप हिंदी कहानियाँ पढना चाहते हैं तो शरत चन्द्र की ये कहानियाँ ज़रूर पढ़ें|

 शरत चंद्र की कहानियाँ | Sharat Chandra Stories In Hindi 


अनुपमा का प्रेम | Anupama Ka Prem
अभागी का स्वर्ग | Abhagi Ka Swarg
विलासी | Vilasi

[post_ads_2]

अनुपमा का प्रेम | Anupama Ka Prem


ग्यारह वर्ष की आयु से ही अनुपमा उपन्यास पढ़-पढ़कर मष्तिष्क को एकदम बिगाड़ बैठी थी। वह समझती थी, मनुष्य के हृदय में जितना प्रेम, जितनी माधुरी, जितनी शोभा, जितना सौंदर्य, जितनी तृष्णा है, सब छान-बीनकर, साफ कर उसने अपने मष्तिष्क के भीतर जमा कर रखी है। मनुष्य- स्वभाव, मनुष्य-चरित्र, उसका नख दर्पण हो गया है। संसार में उसके लिए सीखने योग्य वस्तु और कोई नही है, सबकुछ जान चुकी है, सब कुछ सीख चुकी है। सतीत्व की ज्योति को वह जिस प्रकार देख सकती है, प्रणय की महिमा को वह जिस प्रकार समझ सकती है,संसार में और भी कोई उस जैसा समझदार नहीं है, अनुपमा इस बात पर किसी तरह भी विश्वाश नही कर पाती। अनु ने सोचा--'वह एक माधवी लता है, जिसमें मंजरियां आ रही हैं, इस अवस्था में किसी शाखा की सहायता लिये बिना उसकी मंजरियां किसी भी तरह प्रफ्फुलित होकर विकसित नही हो सकतीं। इसलिए ढूँढ-खोजकर एक नवीन व्यक्ति को सहयोगी की तरह उसने मनोनीत कर लिया एवं दो-चार दिन में ही उसे मन प्राण, जीवन, यौवन सब कुछ दे डाला। मन-ही-मन देने अथवा लेने का सबको समान अधिकार है, परन्तु गृहण करने से पूर्व सहयोगी को भी आवश्यकता होती है। यहीं आकर माधवीलता कुछ विपत्ति में पड़ गई। नवीन नीरोदकान्त को वह किस तरह जताए कि वह उसकी माधवीलता है, विकसित होने के लिए खड़ी हुई है, उसे आश्रय न देने पर इसी समय मंजरियों के पुष्पों के साथ वह पृथ्वी पर लोटती-पोटती प्राण त्याग देगी।

परन्तु सहयोगी उसे न जान सका। न जानने पर भी अनुमान का प्रेम उत्तरोत्तर वृद्धि पाने लगा। अमृत में विष, सुख में दु:ख, प्रणय में विच्छेद चिर प्रसिद्ध हैं। दो-चार दिन में ही अनुपमा विरह-व्यथा से जर्जर शरीर होकर मन-ही-मन बोली-- 'स्वामी, तुम मुझे गृहण करो या न करो, बदले में प्यार दो या न दो, मैं तुम्हारी चिर दासी हूँ। प्राण चले जाएं यह स्वीकार है, परन्तु तुम्हे किसी भी प्रकार नही छोड़ूंगी। इस जन्म में न पा सकूँ तो अगले जन्म में अवश्य पाऊंगी, तब देखोगे सती-साध्वी की क्षूब्द भुजाओं में कितना बल है।' अनुपमा बड़े आदमी की लड़की है, घर से संलग्न बगीचा भी है, मनोरम सरोवर भी है, वहां चांद भी उठता है, कमल भी खिलते है, कोयल भी गीत गाती है, भौंरे भी गुंजारते हैं, यहां पर वह घूमती फिरती विरह व्यथा का अनुभव करने लगी। सिर के बाल खोलकर, अलंकार उतार फेंके, शरीर में धूलि मलकर प्रेम-योगिनी बन, कभी सरोवर के जल में अपना मुंह देखने लगी, कभी आंखों से पानी बहाती हुई गुलाब के फूल को चूमने लगी, कभी आंचल बिछाकर वृक्ष के नीचे सोती हुई हाय की हुताशन और दीर्घ श्वास छोड़ने लगी, भोजन में रुचि नही रही, शयन की इच्छा नहीं, साज-सज्जा से बड़ा वैराग्य हो गया, कहानी किस्सों की भांति विरक्ति हो आई, अनुपमा दिन-प्रतिदिन सूखने लगी, देख सुनकर अनु की माता को मन-ही-मन चिन्ता होने लगी, एक ही तो लड़की है, उसे भी यह क्या हो गया ? पूछने पर वह जो कहती, उसे कोई भी समझ नही पाता, ओठों की बात ओठों पे रह जाती। अनु की माता फिर एक दिन जगबन्धु बाबू से बोली-- 'अजी, एक बार क्या ध्यान से नही देखोगे? तुम्हारी एक ही लड़की है, यह जैसे बिना इलाज के मरी जा रही है।'
जगबन्धु बाबू चकित होकर बोले-- 'क्या हुआ उसे?'
पूरी कहानी पढ़ें

[next][post_ads]

अभागी का स्वर्ग | Abhagi Ka Swarg



सात दिनों तक ज्वरग्रस्त रहने के बाद ठाकुरदास मुखर्जी की वृद्धा पत्नी की मृत्यु हो गई। मुखोपाध्याय महाशय अपने धान के व्यापार से काफी समृद्ध थे। उन्हें चार पुत्र, चार पुत्रियां और पुत्र-पुत्रियों के भी बच्चे, दामाद, पड़ोसियों का समूह, नौकर-चाकर थे-मानो यहां कोई उत्सव हो रहा हो।
धूमधाम से निकलने वाली शव-यात्रा को देखने के लिए गांव वालों की काफी भीड़ इकट्ठी हो गई। लड़कियों ने रोते-रोते माता के दोनों पांवों में गहरा आलता और मस्तक पर बहुत-सा सिन्दूर लगा दिया। बहुओं ने ललाट पर चन्दन लगाकर बहुमूल्य वस्त्रों से सास की देह को ढंक दिया, और अपने आंचल के कोने से उनकी पद-धूलि झाड़ दी। पत्र, पुष्प, गन्ध, माला और कलरव से मन को यह लगा ही नहीं कि यहां कोई शोक की घटना हुई है-ऐसा लगा जैसे बड़े घर की गृहिणी, पचास वर्षों बाद पुन: एक बार, नयी तरह से अपने पति के घर जा रही हो।
शान्त मुख से वृद्ध मुखोपाध्याय अपनी चिर-संगिनी को अन्तिम विदा देकर, छिपे-छिपे दोनों आंखों के आंसू पोंछकर, शोकार्त कन्या और बहुओं को सान्त्वना देने लगे। प्रबल हरि-ध्वनि (राम नाम सत्य है) से प्रात:कालीन आकाश को गुंजित कर सारा गांव साथ-साथ चल दिया।

एक दूसरा प्राणी भी थोड़ी दूर से इस दल का साथी बन गया-वह थी कंगाली की मां। वह अपनी झोंपड़ी के आंगन में पैदा हुए बैंगन तोड़कर, इस रास्ते से हाट जा रही थी। इस दृश्य को देखकर उसके पग हाट की ओर नहीं बढ़े। उसका हाट जाना रुक गया, और उसके आंचल में बैंगन बंधे रह गए। आंखों से आंसू बहाती हुई-वह सबसे पीछे श्मशान में आ उपस्थित हुई। श्मशान गांव के एकान्त कोने में गरुड़ नदी के तट पर था। वहां पहले से ही लकड़ियों का ढेर, चन्दन के टुकड़े, घी, धूप, धूनी आदि उपकरण एकत्र कर दिए गए थे। कंगाली की मां को निकट जाने का साहस नहीं हुआ। अत: वह एक ऊंचे टीले पर खड़ी होकर शुरू से अन्त तक सारी अन्त्येष्टि क्रिया को उत्सुक नेत्रों से देखने लगी।
पूरी कहानी पढें

[next][post_ads_2]

विलासी | Vilasi

पक्का दो कोस रास्ता पैदल चलकर स्कूल में पढ़ने जाया करता हूँ। मैं अकेला नहीं हूँ, दस-बारह जने हैं। जिनके घर देहात में हैं, उनके लड़कों को अस्सी प्रतिशत इसी प्रकार विद्या-लाभ करना पड़ता है। अत: लाभ के अंकों में अन्त तक बिल्कुल शून्य न पड़ने पर भी जो पड़ता है, उसका हिसाब लगाने के लिए इन कुछेक बातों पर विचार कर लेना काफी होगा कि जिन लड़कों को सबेरे आठ बजे के भीतर ही बाहर निकल कर आने-जाने में चार कोस का रास्ता तय करना पड़ता है, चार कोस के माने आठ मील नहीं, उससे भी बहुत अधिक। बरसात के दिनों में सिर पर बादलों का पानी और पाँवों के नीचे घुटनों तक कीचड़ के बदले धूप के समुद्र में तैरते हुए स्कूल और घर आना-जाना पड़ता है, उन अभागे बालकों को माँ—सरस्वती प्रसन्न होकर वर दें कि उनके कष्टों को देखकर वे कहीं अपना मुँह दिखाने की बात भी नहीं सोच पातीं। तदुपरान्त यह कृतविद्य बालकों का दल बड़ा होकर एक दिन गांव में ही बैठे या भूख की आग बुझाने के लिए कहीं अन्यत्र चला जाय, उनके चार कोस तक पैदल आने जाने की विद्या का तेज आत्म-प्रकाश करेगा-ही-करेगा। कोई-कोई को कहते सुना है, ‘अच्छा, जिन्हें भूख की आग है, उनकी बात भले ही छोड़ दी जाय, परन्तु जिन्हें वह आग नहीं है, वैसे सब भले आदमी किस जाने किस गाँव के लड़के की डायरी से उद्धृत। 
पूरी कहानी पढ़े

COMMENTS

इस पोस्ट से सम्बंधित कुछ लेख:

Name

अटल बिहारी वाजपेयी,1,आरतियाँ,2,कब्ज,1,घरेलू नुस्खे,9,चालीसा,4,डायबिटीज,1,पथरी,1,बवासीर इलाज,1,मोटापा,1,शरत चन्द्र,3,हिंदी कहानियाँ,2,
ltr
item
Khabar Only | ताज़ा खबर- न्यूज़ इन हिंदी: शरत चंद्र की कहानियाँ हिंदी में | Sharat Chandra Stories In Hindi
शरत चंद्र की कहानियाँ हिंदी में | Sharat Chandra Stories In Hindi
Sharat chandra stories in hindi, sharat chandra famous stories,शरत चन्द्र की कहानियाँ हिंदी में, शरत चन्द्र के उपन्यास, अभागी का स्वर्ग, विलासी,अनुपमा का प्रेम
https://1.bp.blogspot.com/-n1srSeeA4dM/W2W81LigpEI/AAAAAAAABGE/IE5KF6rCGI0wAc0blymkvl57W3E5vlPFgCPcBGAYYCw/s1600/sharat%2Bchandra%2Bstories%2Bin%2Bhindi%25E0%25A4%25B6%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%25A4%2B%25E0%25A4%259A%25E0%25A4%25A8%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25A6%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25B0%2B%25E0%25A4%2595%25E0%25A5%2580%2B%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25B9%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%25AF%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%2581.jpeg
https://1.bp.blogspot.com/-n1srSeeA4dM/W2W81LigpEI/AAAAAAAABGE/IE5KF6rCGI0wAc0blymkvl57W3E5vlPFgCPcBGAYYCw/s72-c/sharat%2Bchandra%2Bstories%2Bin%2Bhindi%25E0%25A4%25B6%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%25A4%2B%25E0%25A4%259A%25E0%25A4%25A8%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25A6%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25B0%2B%25E0%25A4%2595%25E0%25A5%2580%2B%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25B9%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%25AF%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%2581.jpeg
Khabar Only | ताज़ा खबर- न्यूज़ इन हिंदी
http://www.khabaronly.com/2018/08/sharat-chandra-stories-in-hindi.html
http://www.khabaronly.com/
http://www.khabaronly.com/
http://www.khabaronly.com/2018/08/sharat-chandra-stories-in-hindi.html
true
4086057271536295392
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS CONTENT IS PREMIUM Please share to unlock Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy