विलासी | Vilasi A Sharat Chandra Stories In Hindi

विलासी | Vilasi A Sharat Chandra Stories In Hindi

विलासी शरत चन्द्र की हिंदी में कहानिया

क्का दो कोस रास्ता पैदल चलकर स्कूल में पढ़ने जाया करता हूँ। मैं अकेला नहीं हूँ, दस-बारह जने हैं। जिनके घर देहात में हैं, उनके लड़कों को अस्सी प्रतिशत इसी प्रकार विद्या-लाभ करना पड़ता है। अत: लाभ के अंकों में अन्त तक बिल्कुल शून्य न पड़ने पर भी जो पड़ता है, उसका हिसाब लगाने के लिए इन कुछेक बातों पर विचार कर लेना काफी होगा कि जिन लड़कों को सबेरे आठ बजे के भीतर ही बाहर निकल कर आने-जाने में चार कोस का रास्ता तय करना पड़ता है, चार कोस के माने आठ मील नहीं, उससे भी बहुत अधिक। बरसात के दिनों में सिर पर बादलों का पानी और पाँवों के नीचे घुटनों तक कीचड़ के बदले धूप के समुद्र में तैरते हुए स्कूल और घर आना-जाना पड़ता है, उन अभागे बालकों को माँ—सरस्वती प्रसन्न होकर वर दें कि उनके कष्टों को देखकर वे कहीं अपना मुँह दिखाने की बात भी नहीं सोच पातीं। तदुपरान्त यह कृतविद्य बालकों का दल बड़ा होकर एक दिन गांव में ही बैठे या भूख की आग बुझाने के लिए कहीं अन्यत्र चला जाय, उनके चार कोस तक पैदल आने जाने की विद्या का तेज आत्म-प्रकाश करेगा-ही-करेगा। कोई-कोई को कहते सुना है, ‘अच्छा, जिन्हें भूख की आग है, उनकी बात भले ही छोड़ दी जाय, परन्तु जिन्हें वह आग नहीं है, वैसे सब भले आदमी किस जाने किस गाँव के लड़के की डायरी से उद्धृत। उनका असली नाम जानने की किसी को आवश्यकता नहीं, निषेध भी है।[post_ads] चालू नाम तो रख लीजिये- न्याड़ा (जिसके केश मुड़े हों)। सुख के लिए गाँव छोड़कर जाते हैं ? उनके रहने पर तो गाँव की ऐसी दुर्दशा नहीं होती।’ मलेरिया की बात नहीं छेड़ता। उसे रहने दो, परन्तु इन चार कोस तक पैदल चलने की आग में कितने भद्र लोग बाल-बच्चों को लेकर गाँव छोड़कर शहर चले गए हैं, उनकी कोई संख्या नहीं है। इसके बाद एक दिन बाल-बच्चों का पढ़ना-लिखना भी समाप्त हो जाता है, तब फिर शहर की सुख सुविधा में रुचि लेकर वे लोग गाँव में लौटकर नहीं आ पाते ! परन्तु रहने दो इन सब व्यर्थ बातों को। स्कूल जाता हूँ- दो कोस के बीच ऐसे ही दो-तीन गाँव पार करने पड़ते हैं। किसके बाग में आम पकने शुरू हुये हैं, किस जंगल में करौंदे काफी लगे हैं, किसके पेड़ पर कटहल पकने को हैं, किसके अमृतवान केले की गहर करने वाली ही है, किसके घर के सामने वाली झाड़ी में अनन्नास का फल रंग बदल रहा है, किसकी पोखर के किनारे वाले खजूर के पेड़ से खजूर तोड़कर खाने से पकड़े जाने की संभावना कम है, इन सब खबरों को लेने में समय चला जाता है, परन्तु जो वास्तविक विद्या है, कमस्फट्का की राजधानी का क्या नाम है एवं साइबेरिया की खान में चाँदी मिलती है या सोना मिलता है-यह सब आवश्यक तथ्य जानने का तनिक भी फुरसत नहीं मिलती। इसीलिए इम्तहान के समय ‘एडिन क्या है’ पूछे जाने पर कहता ‘पर्शिया का बन्दर’ और हुमायूँ के पिता का नाम पूछे जाने पर लिख आया तुगलक खाँ-एवं आज चालीस का कोठा पार हो जाने पर भी देखता हूँ, उन सब विषयों में धारणा प्राय: वैसी ही बनी हुई है-तदुपरान्त प्रमोशन के दिन मुँह लटकाकर घर लौट आता और कभी दल बाँधकर मास्टर को ठीक करने की सोचता, और कभी सोचता, ऐसे वाहियात स्कूल को छोड़ देना ही ठीक है। हमारे गाँव के एक लड़के के साथ बीच-बीच में स्कूल मार्ग पर भेंट हो जाया करती थी। उसका नाम था मृत्युन्जय। मेरी अपेक्षा वह बहुत बड़ा था। तीसरी क्लास में पढ़ता था। कब वह पहले-पहल तीसरी क्लास में चढ़ा, यह बात हममें से कोई नहीं जानता था-सम्भवत:वह पुरातत्वविदों की गवेषणा का विषय था, परन्तु हम लोग उसे इस तीसरे क्लास में ही बहुत दिनों से देखते आ रहे थे। उसके चौथे दर्जे में पढ़ने का इतिहास भी कभी नहीं सुना था, दूसरे दर्जे से चढ़ने की खबर भी कभी नहीं मिली थी। मृत्युन्जय के माता-पिता, भाई-बहिन कोई नहीं थे, था केवल गाँव के एक ओर एक बहुत बड़ा आम-कटहल का बगीचा और उसके बीच एक बहुत बड़ा खण्डहर-सा मकान, और थे एक दूसरे के रिस्ते के चाचा। चाचा का काम था भतीजे को अनेकों प्रकार से बदनामी करते रहना, ‘वह गाँजा पीता है’ ऐसे ही और भी क्या-क्या ! उनका एक और काम था यह कहते फिरना, ‘इस बगीचे का आधा हिस्सा उनका है, नालिश करके दखल करने भर की देर है।’ उन्होंने एक दिन दखल भी अवश्य पा लिया, परन्तु वह जिले की अदालत में नालिश करके ही, ऊपर की अदालत के हुक्म से। परन्तु वह बात पीछे होगी। मृत्युन्जय स्वयं ही पका कर खाता एवं आमों की फसल में आम का बगीचा किसी को उठा देने पर उसका सालभर खाने-पहिनने का काम चल जाता, और अच्छी तरह ही चल जाता। जिस दिन मुलाकात हुई, उसी दिन देखा, वह छिन्न-भिन्न मैली किताबों को बगल में दबाये रास्ते के किनारे चुप-चाप चल रहा है। उसे कभी किसी के साथ अपनी ओर से बातचीत करते नहीं देखा-अपितु अपनी ओर से बात स्वयं हमीं लोग करते। उसका प्रधान कारण था कि दूकान से खाने-पीने की चीजें खरीदकर खिलाने वाला गाँव में उस जैसा कोई नहीं था। और केवल लड़के ही नहीं ! कितने ही लड़कों के बाप कितनी ही बार गुप्त रूप से अपने लड़कों को भेजकर उसके पास ‘स्कूल की फीस खो गई है’ पुस्तक चोरी चली गई’ इत्यादि कहलवा कर रुपये मँगवा लेते, इसे कहा नहीं जा सकता।[post_ads_2] परन्तु ऋण स्वीकार करने की बात तो दूर रही, उसके लड़के ने कोई बात भी की है, यह बात भी कोई बाप भद्र-समाज में कबूल नहीं करना चाहता-गाँव भर में मृत्युन्जय का ऐसा ही सुनाम था। बहुत दिनों से मृत्युन्जय से भेंट नही हुई। एक दिन सुनाई पड़ा, वह मराऊ रक्खा है। फिर एक दिन सुना गया, मालपाड़े के एक बुड्ढ़े माल ने उसका इलाज करके एवं उसकी लड़की विलासी ने सेवा करके मृत्युन्जय को यमराज के मुँह में जाने से बचा लिया है। बहुत दिनों तक मैंने उसकी बहुत-सी मिठाई का सदुपयोग किया था-मन न जाने कैसा होने लगा, एक दिन शाम के अँधेरे में छिपकर उसे देखने गया- उसके खण्डर-से मकान में दीवालों की बला नहीं है। स्वच्छन्दता से भीतर माल- बंगाल की एक जाति जो साँप के काटे का इलाज करती है। घुसकर देखा, घर का दरवाजा खुला है, एक बहुत तेज दीपक जल रहा है, और ठीक सामने ही तख्त के ऊपर धुले-उजले बिछौने पर मृत्युन्जय सो रहा है। उसके कंकाल जैसे शरीर को देखते ही समझ में आ गया, सचमुच ही यमराज ने प्रयत्न करने में कोई कमी नहीं रक्खी, तो भी वह अन्त तक सुविधापूर्वक उठा नहीं सका, केवल उसी लड़की के जोर से। वह सिरहाने बैठी पंखे से हवा झल रही थी। अचानक मनुष्य को देख चौंककर उठ खड़ी हुई। यह उसी बुड्ढ़े सपेरे की लड़की विलासी है। उसकी आयु अट्ठारह की है या अट्ठाईस की-सो ठीक निश्चित नहीं कर सका, परन्तु मुँह की ओर देखने भर से खूब समझ गया, आयु चाहे जो हो, मेहनत करते-करते और रात-रात भर जागते रहने से इसके शरीर में अब कुछ नहीं रहा है। ठीक जैसे फूलदानी में पानी देकर भिगो रक्खे गये बासी फूल की भाँति हाथ का थोड़ा-सा स्पर्श लगते ही, थोड़ा-सा हिलाते-डुलाते ही झड़ पड़ेगा। मृत्युन्जय मुझे पहिचानते हुये बोला- ‘कौन न्याड़ा ?’ बोला- ‘हाँ।’ मृत्युन्जय ने कहा- ‘बैठो।’ लड़की गर्दन झुकाए खड़ी रही। मृत्युन्जय ने दो-चार बातों में जो कहा, उसका सार यह था कि उसे खाट पर पड़े डेढ़ महीना हो चला है। बीच में दस-पन्द्रह दिन वह अज्ञान-अचैतन्य अवस्था में पड़ा रहा, अब कुछ दिन हुए वह आदमियों को पहिचानने लगा है, यद्यपि अभी तक वह बिछौना छोड़कर उठ नहीं सकता, परन्तु अब कोई डर की बात नहीं है।

COMMENTS

इस पोस्ट से सम्बंधित कुछ लेख:

Name

अटल बिहारी वाजपेयी,1,आरतियाँ,2,कब्ज,1,घरेलू नुस्खे,9,चालीसा,4,डायबिटीज,1,पथरी,1,बवासीर इलाज,1,मोटापा,1,शरत चन्द्र,3,हिंदी कहानियाँ,2,
ltr
item
Khabar Only | ताज़ा खबर- न्यूज़ इन हिंदी: विलासी | Vilasi A Sharat Chandra Stories In Hindi
विलासी | Vilasi A Sharat Chandra Stories In Hindi
https://2.bp.blogspot.com/-tuv8AOK-g9U/W2g5tWm2o9I/AAAAAAAABI8/9KkLos038P0HlPCOpHbkmBdLsw50tYUjgCLcBGAs/s1600/vilasi%2Bsharat%2Bchandra%2Bki%2Bkahani%2B%25E0%25A4%25B5%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%25B2%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25B8%25E0%25A5%2580%2B%25E0%25A4%25B6%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%25A4%2B%25E0%25A4%259A%25E0%25A4%25A8%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25A6%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25B0.jpg
https://2.bp.blogspot.com/-tuv8AOK-g9U/W2g5tWm2o9I/AAAAAAAABI8/9KkLos038P0HlPCOpHbkmBdLsw50tYUjgCLcBGAs/s72-c/vilasi%2Bsharat%2Bchandra%2Bki%2Bkahani%2B%25E0%25A4%25B5%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%25B2%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25B8%25E0%25A5%2580%2B%25E0%25A4%25B6%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%25A4%2B%25E0%25A4%259A%25E0%25A4%25A8%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25A6%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25B0.jpg
Khabar Only | ताज़ा खबर- न्यूज़ इन हिंदी
http://www.khabaronly.com/2018/08/vilasi-sharat-chandra-stories-in-hindi.html
http://www.khabaronly.com/
http://www.khabaronly.com/
http://www.khabaronly.com/2018/08/vilasi-sharat-chandra-stories-in-hindi.html
true
4086057271536295392
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS CONTENT IS PREMIUM Please share to unlock Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy