देश और समाज की तरक्की में मदारिस व ओलमा ए हिन्द का रोल

 


एम ए अजहर कासमी

केन्द्रीय अध्यक्ष एम एम यू झारखण्ड

रांची: भारत की आजादी में मदारीस और ओलमा ने महत्वपुर्ण योगदान दिया इतिहास के पन्नों में लाखों की तादाद में मदारीस से पढ़ कर निकलने वाले ओलमा हुफ्फाज एवं बुद्धिदीवी वर्गों ने ये मिसाल किरदार अदा किया है। भारत की आजादी के बाद मदारीस और ओलमा की जिम्मदारी दुगनी हो गई। मदारीस ने समाज के गरीब एवं पिछड़े वर्गों के बच्चे एवं बच्चीयों को शिक्षीत करने के लिए टूटी पटाइयों में बैठ कर पेड़ के साये में बच्चों को लेकर नये भारत की नय निमार्ण के लिए ओलमा ने बेमिसाल किरदार अदा किया है। दारूल उलूम देवबंद का स्थापना 1866 में किया गया दारूल उलूम देवबंद एशया का सबसे बड़ा शिक्षन केंद्र है। दारूल उलूम का पहला विध्यार्थी महमूद हसन जिन्होंने अपने पूर्वजों एवं ओलमा के पैगाम को लेकर आगे बढ़े रेशमी रूमाल तहरीक के फाउनड महमूद हसन जिन्हें दुनिया शैखुल हिन्द महमूदुल हसन देवबंदी के नाम से जानती है।

 अंग्रेज ने तहरीके आजादी के मोजाहिद एवं कमांडर होने की वजह से काले पानी का सजा सुनाया और आपको मालटा के जेल में बंद कर दिया गया। दारूल उलूम देवबंद और भारत के विभिन्न क्षेत्रों में शहर एवं ग्रामीण हलकों में चल रहे मदरसों के पढे हुए विध्यार्थीयों ने भारत की आजादी के लिए बेमिसाल कुर्बानीया दिया है। दुनिया में यह कौम जिंदा रहती है जिनका अपना कलचर लीपी एवं भाषाओं पर कमांड होता है। मौजूदा दौर ने साइंस एवं टेक्नालॉजी में तरक्की हुई है इस साइंसी दौर में मदरसा का छात्र देश का सबसे बड़ा मिसाईल मेन बन जाता है ये मदरसा की बरकत है कि टुटी चटाई में बैठ कर ज्ञान हासिल करने वाला जिसे दुनिया एपीजी अब्दुल कलाम के नाम से जानती है भारत को दुनिया के ताकतवर मुल्कों के सफों में खड़ा कर दिया मदरसा से ज्ञान हासिल करने वाले भारत के पहला राष्ट्रपति पहला प्रधानमंत्री, पहला गृहमंत्री, पहला शिक्षा मंत्री, जैसे हजारों के संख्या में मदारिस से देश के सीपाही पैदा होते रहे हैं।

 इस आधुनीक दौर में मदारिस के संचालकों को अपने तालीमी नेजाम को और गति देने के लिए छात्रों की शक्ति को हर संभावित प्रयास कर उस काबिल बना दिया जाए के मुल्क और समाज के तरक्की के लिए जहां योगदान को जरूरत हो अपनी सलाहयतों के द्वारा देश एवं समाज के नव निर्माण में महत्वपूर्ण किरदार अदा कर सके भारत में दो तरह के मदरसे संचालित हैं। एक मदरसा शिक्षा बोर्ड की निगरानी में चलता है जिन्हें राज्य सरका द्वारा वेतन दिया जाता है। दुसरा आजाद मदरसा जो संविधान में दिये गये अधिकारों के अनुकूल चलता है। इस मदरसे में मुल्क के गरीब बच्चीयों का पूरी जिम्मदारी मदरसों के संचालन कर रहे लोगों के द्वारा जकात, सदका एवं दान के द्वारा चलाया जाता है। मौजूदा दौर में जरूरत है कि दोनों तरह के मदरसा में आधुनिक तालीम को भी अपने सलेबस में जगह देकर बच्चों को जमाने के तकाजों के मुताबिक तैयार करने के लिए मदारीस के संचालक एवं समाज के बुद्धिजिवी लोगों को मिल बैठ कर गौर करना चाहिए। मुस्लिम मंजिलस ए उलमा झारखण्ड का मानना है कि एक मौके से मौलाना अलीम मियां नदवी ने कहा था कि आपका मुखात जिस भाषा में समझता हो उसी भाषा में उसको अगर आप अपना पैगाम देते हैं तो सामने वाले का दिल दिमाग सुन कर समझ कर जल्द कबुल करेगा हम सब को मी इस भावनाओं को और तकाजों को समझने के लिए शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में मदारीस के संचालकों को आपसी अदान प्रदान के लिए और एक दूसरे को सहयोग करने के लिए सर जोड़ कर बैठना चाहिए भारत में जितना धार्मीक ज्ञान की जरूरत है उतना ही भारतीय संविधान को भी पढ़कर समझ कर समाज में फैलाना और विकसित समाज तैयार करना ताकि सबको मिल कर एक खुशहाल भारत और विकसित समाज बनाने में मदद मिल सके 1

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